02 December, 2022

विश्वेश्वर दत्त सकलानी-वृक्ष मानव

vishweshwer datt tree-man uttarakhand

विश्वेश्वर दत्त सकलानी जिन्होंने 50 लाख से अधिक वृक्षारोपण किया- पहाड़ का मांझी

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एक वनऋषि जिन्होनें मात्र 8 साल की उम्र से पेड लगाने शुरु किए और अब तक 50 लाख से अधिक पेड लगा चुके है। ये पहाड का मांझी है। जिसने अपनी मेहनत से विशाल जंगल तैयार कर दिया। विश्वेश्वर दत्त सकलानी जीवन भर पेड़ो के लिए जीये, उम्र के आखिरी पड़ाव में आंखों की रोशनी भी खो चुके थे, जबान से लडखडाते हुए केवल यही शब्द निकलते है वृक्ष मेरे माता पिता…..वृक्ष मेरे संतान…….वृक्ष मेरे सगे साथी ……..आखिरकार यह ट्री मैन जिसने बिना स्वार्थ प्रकृति की सेवा की 18 जनवरी 2019 को प्रकृति की गोद में सो गया और पीछे छोड़ गया एक सोच।

उत्तराखंड में एक ऐसे मानव हैं जिसे वृक्षमानव कहा जाता है  जिन्होंने अपना पूरा जीवन वृक्षों को दे दिया। वृक्ष मानव की उपाधि से सम्मानित श्री विश्वेस्वर दत्त सकलानी और उनके द्वारा लगाया गया वन साम्राज्य आज कई जल स्रोतों और पूरी घाटी को नया जीवनदान दे रहा है। मात्र 5 साल की उम्र में विश्वेश्वर दत्त सकलानी ने 50 लाख से ज्यादा पेड लगाए। टिहरी गढवाल के पुजार गांव में जन्मे विश्वेश्वर द्त्त सकलानी का जन्म 2 जून 1922 को हुआ था। उनकी पहली पत्नी से एक बेटी और दूसरी पत्नी से 4 बेटे और 4 बेटियां हुई। पूरे जीवन भर उन्होने वृक्षारोपण को समर्पित कर दिया। असली ग्रीन हीरो विश्वेश्वर दत्त सकलानी है जिन्होंने पूरी सकलाना घाटी को अपने भगीरथ प्रयास से हरा भरा कर दिया।

Sarda Devi uttarakhand

पत्नी और भाई की मौत ने जंगल और पर्यावरण से जोड दिया

बचपन से विश्वेश्वर दत्त को पेड लगाने का शौक था और वे अपने दादा के साथ जंगलों में पेड लगाने जाते रहते थे। इनका जीवन भी माउन्टेंन मैन दशरथ मांझी की तरह है जिन्होंने एक सडक के लिए पूरा पहाड खोद दिया। दरशत मांझी की तरह विश्वेश्वर दत्त सकलानी के जिन्दगी में अहम बदलाव तब आया जब उनकी पत्नी शारदा देवी का देहांत हुआ। 11 जनवरी 1948 को उनके बडे भाई नागेन्द्र सकलानी टिहरी रियासत के खिलाफ विद्रोह में शहीद हो गए है और फिर 11 जनवरी 1956 को उनकी पहली पत्नी शारदा देवी का देहांत हो गया। इन घटनाओं ने उनका वृक्षों से लगाव और बढा दिया और उनके जीवन का एक ही उद्देश्य बन गया केवल वृक्षारोपण। विश्वेश्वर दत्त सकलानी के बेटे संतोष सकलानी कहते है कि पिता के सपने और आगे बढ़ाना है।

धरती मां के लिए विश्वेश्वर दत्त ने आंखो की रोशनी गवां दी

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विश्वेश्वर दत्त सकलानी पिछले 80 सालों से वृक्षारोपण कर रहे है। अब सोचिए जिसने धरती मां के लिए अपनी आंखो की रोशनी गंवा दी। डाक्टरों ने उन्हें धूल मिट्टी और अत्यधिक परिश्रम से दूर रहने की सलाह दी थी लेकिन वृक्षारोपण का जूनून इस कदर सवार था कि उन्होने डाक्टरों की सलाह की कोई परवाह नही की। आखिरकार 2007 आई हेम्रेज होने के कारण उनकी आंखों की रोशनी चली गई। उसके बाद उन्हे चलने फिरने में भी दिक्कत हो गई। जीवन के अंतिम दिनों में उन्होंने गाँव में अपने बेटे के साथ बिताए। अपनी दूसरी पत्नी  भगवती देवी के साथ पुजार गांव में रहे। जीवन के अंतिम दिनों में मैंने भी उनके दर्शन किये।ऐसा लगता था कि खुद एक पेड़ हमसे कुछ कह रहा है।

आखिर कैसी बदली पूरी सकलानी घाटी की तस्वीर

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विश्वेश्वर दत्त सकलानी ने कई वर्षो की कड़ी मेहनत के बाद सकलानी घाटी की पूरी तस्वीर बदल दी। दरअसल करीब 60- 70 साल पहले इस पूरे इलाके में अधिकतर इलाका वृक्षविहीन था। धीरे धीरे उन्होने बांज, बुरांश, सेमल, भीमल और देवदार के पौधे को लगाना शुरु किया। शुरु शुरु में ग्रामीणों ने इसका काफी विरोध किया। क्योकि खाली पहाड़ में घास होती थी जो स्थानीय लोगो के जानवरों के कार्य आती थी। यहां तक कि उन्हे कई बार मारा भी गया लेकिन धरती मां के इस हीरो ने अपना जूनून नही छोडा। जब ग्रामीणों को अपने पशुओं के चारा और सूखते जलस्रोतों में जलधाराएं फूटने लगी तो ग्रामीण भी इस मुहिम में विश्वेश्वर दत्त के साथ जुड गए और आज स्थिति ये है कि करीब 12 हेक्टियर से भी अधिक क्षेत्रफल में उनके द्वारा तैयार किया जंगल खडा हो चुका है।

50 लाख पेड़ों का वृक्षारोपण कर बनाया इतिहास

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2004 में वन विभाग और निजी संस्था ने विश्वेश्वर दत्त सकलानी द्वारा लगाए गये वृक्षों का आंकलन किया तो करीब 50 लाख से अधिक पेड सामने आए साथ ही और इस वन संपदा का आंकलन करीब साढे चार हजार करोड आंका गया। ग्रामीण आज हरे भरे जंगल देखकर खुश है लेकिन उन्हे इस बाद का आक्रोश है कि 85 वर्ष की तपस्या से खडा हुआ जंगल आज संरक्षण के अभाव में नष्ट हो रहा है। विश्वेश्वर दत्त सकलानी परिजन सीधे केेंद्र और राज्य सरकार से भी गुहार लगा रहे है कि वे इस जंगल को बचा ले। विश्वेश्वर दत्त सकलानी के भतीजे मनोहर लाल सकलानी कहते है कि संरक्षण के अभाव में जंगल खतरे में है।

बेटी की शादी के समय कन्यादान के दौरान वृक्षारोपण के लिए जंगल चले गए

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विश्वेश्रर दत्त सकलानी ने अपना पूरा जीवन पहाड के लिए दे दिया। त्याग बलिदान और संघर्ष की ऐसी दास्ता आपने शायद ही कहीं देखी होगी। पुजार गांव के बुजुर्ग बताते है कि 1985 में बेटी मंजू कोठारी का विवाह हो रहा था और कन्यादान होने जा रहा था तो उस समय में वो जंगल में वृक्षारोपण करने चले थे। जब काफी खोजबीन की गई तो पता लगा कि वे कुछ पेडों को लेकर गांव के ऊपर जंगल में चले गये। जब ग्रामीण उन्हें लेने जंगल गए और फिर फौरन उन्हें नीचे कन्यादान के लिए लाया गया। लेकिन उसके बाद उन्होने सभी बारातियों से भी वृक्षारोपण कराया। विश्ववेश्वर दत्त सकलानी का जीवन उन पर्यावरविदों के लिए आएना है जो अपने जुगाड के कारण बडे बडे अवार्ड हथिया लेते है लेकिन जमीन में दिखाने के लिए कुछ नही है। मैती आंदोलन के संस्थापक कल्याण सिंह रावत कहते है कि विश्वेश्वर दत्त सकलानी ने धरातल पर रहकर काम किया। उन्होने पूरा जीवन पर्यावरण को समर्पित कर दिया।

जंगल में पेड लगाने पर वन विभाग ने मुकदमा भी दर्ज किया

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ऐसा नही है कि विश्वेश्वर दत्त सकलानी की राह में मुश्किलें नही आई। जगलों में बांज, बुरांश, देवदार, अखरोट सहित स्थानीय प्रजाति के वृक्षों को लगाने में सबसे पहले ग्रामीणों ने ही इनका विरोध किया लेकिन उनका जूनून कम नही हुआ। 1987 में वन विभाग ने उनके विरुद्व जंगल में बिना अनुमति के पेड़ लगाने पर मुकदमा भी दर्ज क दिया। मगर उनका विश्वास और जूनून कम नही हुआ। कई वर्षो तक वे इस कानूनी लड़ाई को लडते रहे और अंत में जज ने भी उनकी मेहनत की तारीफ कर वन विभाग को ही कड़ी फटकार लगाई। कोर्ट ने फैसला सुनाया कि वन कानून की धारा 16 के तहत पेड़ लगाना अपराध नही है।

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विश्वेश्वर दत्त सकलानी के साथ पद्श्री सुन्दरलाल बहुगुणा, धूम सिंह नेगी, कुंवर प्रसून और विजय जड़धारी साथ रहे। बीज बचाओ आंदोलन के संस्थापक विजय जड़धारी कहते है कि 1980 के दशक में चिपको आंदोलन के दौरान वे कई बार विश्वेश्वर दत्त सकलानी के साथ वृक्षारोपण के सिलसिले में मिलते थे। विजय जड़धारी कहते है उन्हीं के प्रयासों सकलानी घाटी से निकलने वाली सौंग नदी फिर से पुनर्जीवित हो गई और चिपको आंदोलन के बाद भारत सरकार ने हिमालय में 1 हजार मीटर से अधिक ऊंचाई पर हरे वृक्षों के कटान पर रोक लगा दी। आज उनकी कमी हमें खल रही है। अब राज्य सरकार उस पूरे जंगल को संरक्षित कर इको टूरिज्म के रूप में विकसित करना चाहती है।

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Sandeep Gusain

नमस्ते साथियों।

मैं संदीप गुसाईं एक पत्रकार और content creator हूँ।
और पिछले 15 सालों से विभिन्न इलेक्ट्रानिक मीडिया चैनल से जुडे हूँ । पहाड से जुडी संवेदनशील खबरों लोकसंस्कृति, परम्पराएं, रीति रिवाज को बारीकी से कवर किया है। आपदा से जुडी खबरों के साथ ही पहाड में पर्यटन,धार्मिक पर्यटन, कृषि,बागवानी से जुडे विषयों पर लिखते रहता हूँ । यूट्यूब चैनल RURAL TALES और इस blog के माध्यम से गांवों की डाक्यूमेंट्री तैयार कर नए आयाम देने की कोशिश में जुटा हूँ ।

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