05 December, 2022

पहाड़ का ब्वारी गाँव

the women village uttarakhand

उत्तराखंड में ग्रामीण पर्यटन की अपार संभावनाएं है। पहाड़ के प्राकृतिक सौंदर्य को निहारने और ग्रामीण जीवन को करीब से देखने के लिए हर साल सैलानियों की संख्या में इजाफा हो रहा है। उत्तरकाशी जिले के मथोली गाँव की कहानी भी कुछ नया संदेश दे रही है। इस गॉंव के एक युवा प्रदीप पंवार ने अपनी छानी (पशुओं के लिए बनाया घर) को नया रूप को देकर अपने गॉंव में स्वरोगजार की शुरूआत की है।

गाँव को दिया ब्वारी गाँव की पहचान

प्रदीप पंवार ने पिछले साल अपनी छानी को एक बेहतरीन होम स्टे में तब्दील कर दिया। प्रदीप कहते है कि वे पिछले 5 सालों से बकरी छाप और ग्रीन पीपुल संस्था से जुड़े है। ग्रामीण पर्यटन पर कार्य करते उन्होंने अपने गॉंव में भी कुछ अलग करने की ठानी। 2020 में जब लॉक डाउन लगा तो उन्होंने अपने गॉंव के पूरे क्षेत्र का भ्रमण किया। तब उन्हें अपने क्षेत्र में पर्यटन की संभावनाओं का पता लगा। प्रदीप कहते है कि अगर मन लगाकर कुछ किया जाए तो फिर सफलता हासिल की जा सकती है।

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मथोली गाँव उत्तराखंड जिले के चिन्यालीसौड़ बाजार से 10 किमी की दूरी पर स्थित है। हाल ही में प्रदीप पंवार ने अपने होम स्टे का शुभारंभ कर दिया जिसे बकरी छाप के सहयोग से संचालित किया जा रहा है। इसे the women village या ब्वारी गाँव का नाम दिया गया है जो गाँव से करीब 300 मीटर की दूरी पर स्थित है। महिला सशक्तिकरण और पहाड़ में महिलाओ के योगदान को देखते हुए इस नाम के साथ ऐसे प्रमोट किया जा रहा है। गाँव की महिलाएं भी इस अभिनव पहल से काफी उत्साहित है।

ब्वारी गाँव में आयोजित हुआ घसियारी महोत्सव

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विगत 6 मार्च को गाँव में पहाड़ की नारी को सम्मानित करने के लिए घसियारी महोत्सव का आयोजन किया गया। पहले गांवो में घास काटने की प्रतियोगिता का आयोजन किया जाता था लेकिन अब धीरे धीरे यह प्रतियोगिता विलुप्त हो रही है। इसलिए महिला दिवस से पहले गांव में घसियारी प्रतियोगिता का आयोजन किया गया। इस प्रतियोगिता में 5 टीमें बनाई गई थी और हर टीम में 8 महिलाएं थी। महिलाओं को घास काटने के लिए 15 मिनट का समय दिया गया था। पहाड़ में घास काटना एक कला है। अब नई लड़किया और बहुएं इस कला में रुचि नही ले रही है और इसे भूलती जा रही है। इस प्रतियोगिता में विजेता टीम से 15 मिनट में 44 किलो घास काट दिया।

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विजेता टीम की लीडर अनिला पंवार ने कहा कि उन्हें गर्व है अपनी पहाडी संस्कृति पर जो आज भी जीवित है। राजेश्वरी देवी ने कहा कि घास काटने के दौरान कई बातों का ध्यान रखना होता है कुछ खरपतवार भी होती है जो नही काटनी होती है। इस प्रतियोगिता को देखने के लिए पूरे गांव की महिलाएं, बच्चे और बुजुर्ग मौजूद रहे। दरअसल पहाड़ में बरसात के बाद नवंबर और दिसम्बर में सर्दियों से पहले पहाड़ो में घास काट लिया जाता है। कई बार घास काटने गई महिलाये यानी घसियारी चोटिल हो जाती है तो कई बार अकाल मृत्य भी हो जाती है। घसेरियों की ये दिनचर्चा हो जाती है। हर दिन अपने मवेशियों के लिए घास लाना।

मथोली गांव से कंडक ट्रेक 

मथोली गांव से कंडक देवता का एक खूबसूरत ट्रैक है। इस ट्रैक में आपको प्रकृति और हिमालय के अद्भुत नजारे दिखाई देंगे।बरसात के दिनों में आपकी आंखें केवल हरियाली और उड़ते बादलों को ही निहारती रहेंगी। इस ट्रैक में हम स्थानीय महिलाओं के साथ 7 मार्च को गए। सुबह मथोली से नाश्ता किया और फिर कुछ खाना पैक कर गाँव से निकल पड़े। जो महिलाये हर दिन इन इलाकों में घसियारी की तरह जाती है वो आज सैलानियों की तरह घूमने जा रही थी। कंडक ट्रैक सड़क से करीब 3 किमी की दूरी पर स्थित है। हम मथोली गांव से ही पैदल गए जो करीब 5 किमी है। आप भी सड़क के बजाय पैदल सफर कर सकते है। पैदल सफर में आनंद ज्यादा आता है। गांव के नजारे देखते हुए आप कब जंगल में प्रवेश कर लेंगे मालूम नही चलेगा।

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पैदल ट्रैक में आपको बुराँश, बाँज, चीड़, काफल और कुछ इलाकों में देवदार भी दिखाई देगा। चूंकि हम मार्च के महीने में इस ट्रैक का लुफ्त ले रहे थे तो फिर बुराँश के लाल फूल पूरे जंगल को महका रहे थे साथ में कचनार, मेहुल, आड़ू, पुलम जैसे पेड़ो से भी रंग बिरंगे फूल खिले हुए थे। खेतो में सरसों पीले फूलों से फाल्गुन की खुश्बू बिखेर रही थी। जंगल ट्रैक काफी मनोरम दृश्यों को दिखाता है। जंगल ट्रैक आपको काफी कुछ सिखाता भी है। हिमालय की एक अच्छी रेंज इस ट्रैक से दिखती है। मार्ग में कई छानिया दिखाई दी लेकिन अभी गॉंव वाले अपने पशुओं को लेकर नही आये है। मिश्रित वनों के कारण जंगल काफी हरा भरा है। मेरे साथ रानीखेत से पूरण बिष्ट भी साथ चल रहे थे। करीब 2 घंटे आराम से ट्रेक करते और जंगल की बारीकियां को देखते हुए हम कंडक देवता के स्थान पर पहुँच गए।

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यह एक 200 मीटर का पहाड़ की चोटी पर एक तप्पड़ है जिसकी ऊँचाई लगभग 2200 मीटर के करीब होगी। बर्फ भी यहाँ पड़ती है। इस स्थान पर शिवजी के गण कंडक देवता का मंदिर है। अप्रैल में स्थानीय महिलाएं ने बताया कि यहाँ मेले का आयोजन किया जाता है। इस जगह से हिमालय की अच्छी श्रृंखला दिखाई देती है जिसमे बंदरपूंछ, काला पीक, श्रीकंठ, गंगोत्री समूह, केदारडोम, केदारनाथ, चौखम्भा सहित गढवाल हिमालय की सभी प्रमुख चोटियाँ दिखती है। इसके अलावा टिहरी झील की झलक भी दिखती है। कंडक ट्रेक से आप मध्य हिमालय की नागटिब्बा रेंज भी देख सकते है। हम जिस समय यहां पहुँचे उस समय जंगलों में आग के कारण विजिबिलिटी कम थी।

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छानी को आलीशान टूरिस्ट डेस्टिनेशन में बदला

पिछले साल जुलाई में जब मैं इस गाँव में गया था उस समय खेतो में गेंहू, राजमा, चौलाई, कौणी, झिंगोरा, मंडुवा और गहत बोई हुई थी। प्रदीप अपने छानी तो तोड़कर उसे फिर से तैयार कर रहे थे। पहाड़ में आज भी पशुओं के लिए बनाई घर लकड़ी, पत्थर, मिट्टी और घास से तैयार किये जाते है। इनकी ऊँचाई करीब 8 फुट से ज्यादा नही होती। अपनी छानी को प्रदीप ने रिनोवेट किया। घर को ऊँचाई दी और इसमें दो सेट तैयार किए जिसमे अटैच बाथरूम भी शामिल है। पानी और बिजली की व्यवस्था की गई। अमूमन यहाँ बिजली और पानी की व्यवस्था नही होती।

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पूरे घर को दोबारा सजाने में एक साल का समय लगा। घर की दीवारें और छत लकड़ी, पत्थर और मिट्टी से बनी है। मिस्त्री भी मथोली गांव के है। पिछले 2 महीने से इस नए आशियाने में कुछ दिन बिताने के लिए काफी संख्या में पर्यटक आ चुके है। प्रदीप कहते है हमने pay would you like कॉन्सेप्ट पर अभी पर्यटकों से बुकिंग के लिए कहा है। इस पुरे इलाके में परंपरागत खेती भी है। हम कोशिश करेंगे कि स्थानीय किसानों की आमदनी को भी बढ़ाया जा सके।

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Contact : Pradeep Panwar
Mob.No. : 9897643289

Sandeep Gusain

नमस्ते साथियों।

मैं संदीप गुसाईं एक पत्रकार और content creator हूँ।
और पिछले 15 सालों से विभिन्न इलेक्ट्रानिक मीडिया चैनल से जुडे हूँ । पहाड से जुडी संवेदनशील खबरों लोकसंस्कृति, परम्पराएं, रीति रिवाज को बारीकी से कवर किया है। आपदा से जुडी खबरों के साथ ही पहाड में पर्यटन,धार्मिक पर्यटन, कृषि,बागवानी से जुडे विषयों पर लिखते रहता हूँ । यूट्यूब चैनल RURAL TALES और इस blog के माध्यम से गांवों की डाक्यूमेंट्री तैयार कर नए आयाम देने की कोशिश में जुटा हूँ ।

2 responses to “पहाड़ का ब्वारी गाँव”

  1. Jag mohan malkoti says:

    Best wishes

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