02 December, 2022

संजीवनी बूटी का गाँव जहाँ वर्जित है हनुमान जी की पूजा

dronagiri uttarakhand

हम सब जानते है हनुमान जी प्रमुख आराध्य देवों में से एक है और जहां-जहां भारतीय रहते हैं, वहां-वहां उनकी पूजा की जाती है। लेकिन बहुत कम लोग जानते है कि हमारे ही देश में एक गाँव ऐसा भी है जहां हनुमान जी की पूजा नहीं की जाती है, यहां तक कि वहां हनुमानजी का कोई मंदिर तक नहीं है। ऐसा इसलिए क्योंकि यहां के रहनवासी हनुमान जी से आज तक नाराज़ हैं। यह जगह है उत्तराखंड स्थित द्रोणागिरि गांव।

द्रोणागिरि गांव

द्रोणागिरि गांव उत्तराखंड के सीमांत जनपद चमोली के जोशीमठ प्रखण्ड के जोशीमठ- नीति मार्ग पर है। यह गांव लगभग 12000 फुट की ऊंचाई पर स्थित है। यहां के लोगों का मानना है कि हनुमानजी जिस पर्वत को संजीवनी बूटी के लिए उठाकर ले गए थे, वह यहीं स्थित था। चूंकि द्रोणागिरि के लोग उस पर्वत की पूजा करते थे, इसलिए वे हनुमानजी द्वारा पर्वत उठाकर ले जाने से नाराज हो गए। यही कारण है कि आज भी यहां हनुमानजी की पूजा नहीं होती। यहां तक कि इस गांव में लाल रंग का झंडा लगाने पर पाबंदी है।

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द्रोणागिरी गाँव उत्तराखंड का ऐतिहासिक गाँव है। ये गाँव समुद्र तल से करीब 3600 मीटर की ऊँचाई पर स्थित है।

द्रोणागिरी गाँव का इतिहास रामायण काल से जुड़ा है। रामायण काल में जब युद्ध में लक्ष्मण मूर्छित हुए तो हनुमान जी ने द्रोणागिरी पर्वत से संजीवनी बूटी लेकर आए थे। इस कारण आज भी इस गाँव के लोग हनुमान जी की पूजा नही करते। जनश्रुति है कि जब हनुमान जी इस गॉंव में संजीवनी बूटी के लिए आये तो उस समय यहाँ पर केवल कुछ ही परिवार रहते थे। अधिक ऊँचाई पर होने के कारण चारों तरफ अंधेरा था।

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हनुमान जी को कुछ समझ नही आया कि संजीवनी बूटी जिस द्रोणागिरी पर्वत पर है वह कहाँ पर है। गाँव में उस समय एक बूढ़ी औरत थी जिससे उन्होंने मार्ग दिखाने का अनुरोध किया लेकिन बूढ़ी औरत ने अपनी अस्वस्थता के कारण चलने से मना कर दिया। इसके बाद हनुमान जी ने उन्हें अपने कंधे पर बैठा कर द्रोणागिरि पर्वत के पास तक ले गए। जैसे है उन्होंने बूढ़ी औरत को नीचे उतारा वह स्वयं कुछ देर के बाद नीचे चली गई।

द्रोणागिरि देवता और हनुमान जी के बीच हुआ युद्ध

जब हुनमान जी द्रोणागिरी पर्वत से संजीवनी बूटी लेने गए तो उन्हें द्रोणागिरी देवता ने ऐसा करने से रोका। जिससे दोनों के बीच युद्ध हुआ तो हनुमान जी ने उनका एक हाथ तोड़ दिया। आज भी जिस व्यक्ति पर द्रोणागिरी का पश्वा आता है उसका एक हाथ उस वक्त सुन्न हो जाता है।

महिलाएं नही होती पूजा में शामिल

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जून माह में हर साल पर्वत देवता की पूजा गाँव के लोग करते है। नीति घाटी में स्थित इस गॉंव के लोग 6 महीने भारी बर्फबारी के बाद निचले इलाकों में आ जाते है और मई अंत में अपने गॉंव जाते है। जून माह में जब पूजा होती है तो उसमें महिलाएं शामिल नही होती है। इसके पीछे भी यही कारण है कि महिला ने ही हनुमान जी को द्रोणागिरी पर्वत का पता बताया था।

द्रोणागिरी से 4 किमी की दूरी पर स्थित है उच्च हिमालयी रहस्यमयी नंदी कुंड

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नंदी कुंड द्रोणागिरी गाँव से 4 किमी की दूरी में स्थित एक सुंदर ग्लेशियर झील है। समुद्र तल से 14 हजार फीट की ऊँचाई पर स्थित इस कुंड से स्थानीय लोगों की आस्था जुड़ी हुई है। नंदी कुंड ट्रैक पर कई मखमली बुग्याल आपका स्वागत करते है। सबसे पहले द्रोणागिरि से आगे आपको भोजपत्र और बुराँश की छोटी प्रजाति के पेड़ दिखाई देंगे उसके बाद ट्री लाइन खत्म हो जाती है। बरसात में अगर आप यहाँ आएंगे तो रंग बिरंगे फूल हर तरफ आपको दिखाई देंगे। इस ट्रैक पर राड़ू डूंगा, कानगौर, हाथगैर और फिर नंदी कुंड बुग्याल पड़ता है।

पौराणिक मान्यता है कि इस कुंड के पास ही पार्वती माँ ने महिसासुर बचने के लिए उस कुंड में छुप गई थी। उस कुंड का वो हिस्सा आज भी गर्म रहता है जिसमें माँ पार्वती छुपी थी। मान्यता है कि इसी स्थान पर माँ पार्वती ने महिसासुर का वध किया था।नंदी कुंड बरसात में अपने पूरे शबाब पर होती है। झील 50 मीटर लंबी और 40 मीटर चौड़ी है। इस कुंड के आस पास हत्था जड़ी, जटामासी, कूट, कुटकी, अतीस, सलाम पंजा, गोगल धूप, ब्रह्मकमल, फेन कमल, दुबकेस, नीलकमल और सूर्य कमल सहित कई जड़ी बूटियां मिलती है जिसकी सुगंध से आप मदहोश हो जाएंगे।

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जड़ी बूटियां ही नही बल्कि अनेक उच्च हिमालय जीव जंतु भी इसके आस पास दिखाई देते है। इसमें भरल, मोनाल, याक, कस्तूति मृग और थार भी यहाँ पाये जाते है। यहाँ आने का सबसे बढ़िया समय सितंबर और अक्टूबर माह है।

द्रोणागिरी ग्लेशियर भी तेजी से पिघल रहा है

द्रोणागिरी गाँव से मात्र 5 किमी की दूरी पर द्रोणागिरी और बागनी ग्लेशियर स्थित है। इस घाटी में यही दोनों ग्लेशियर मौजूद है।द्रोणागिरी 4 किमी लंबा और बागनी ग्लेशियर करीब 12 किमी लंबा है। 13 हजार साल पहले रुइंग गाँव तक ग्लेशियर मौजूद था। इस घाटी में 5 अवशेष ग्लेशियर के आगे बढ़ने के मिलते है जो लेटरल मोरेन के रूप में आज भी सुरक्षित है। द्रोणागिरी गाँव भी ग्लेशियर मोरेन पर बसा है जो लागातर गाँव के नीचे भूस्खलन की चपेट में है। उत्तराखंड में नीति, माणा, जोशीमठ, बद्रीनाथ, गमशाली, बम्पा, हर्सिल, जाडुंग जैसे कई गाँव है जो ग्लेशियर मोरेन में स्थित है।

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वाडिया हिमालयन भू विज्ञान संस्थान के वैज्ञानिकों के शोध की माने तो यह दोनों ग्लेशियर लागातर पीछे खिसक रहे है। ग्लेशियर वैज्ञानिक डॉ मनीष मेहता कहते है ग्लेशियर के पिछलने की दर 15 से 20 मीटर प्रति वर्ष है। मनीष कहते है कि पिछले कई वर्षों से वाडिया संस्थान इन दोनों ग्लेशियर पर शोध कर रहा है।

कैसे पहुँचे द्रोणागिरी गाँव?

द्रोणागिरि गाँव चमोली जिले के जोशीमठ ब्लॉक में स्थित है। जोशीमठ से नीति घाटी में तपोवन से आगे जुम्मा गाँव से द्रोणागिरि के लिए जाना होता है। जुम्मा से 3 किमी  सड़क रूइंग गाँव तक पहुँच गई है और रूइंग से आगे द्रोणागिरी तक सड़क निर्माणाधीन है। रुइंग से आप 10 किमी पैदल सफर कर इस गॉंव तक पहुँच सकते है। मार्ग में आपको देवदार, रागा के जंगल मिलेंगे।जैसे जैसे आप आगे बढ़ेंगे तो आपको भोजपत्र के जंगल मिलने शुरू हो जायेगे। इस मार्ग में कई औषधीय पेड़ो और जड़ी बूटियों का खजाना छुपा है। रुइंग से 10 किमी चढ़ाई है जो कही सीधी तो कही पर हल्की तिरछी हो जाती है।

संपर्क 

उदय रावत-8477872790

Sandeep Gusain

नमस्ते साथियों।

मैं संदीप गुसाईं एक पत्रकार और content creator हूँ।
और पिछले 15 सालों से विभिन्न इलेक्ट्रानिक मीडिया चैनल से जुडे हूँ । पहाड से जुडी संवेदनशील खबरों लोकसंस्कृति, परम्पराएं, रीति रिवाज को बारीकी से कवर किया है। आपदा से जुडी खबरों के साथ ही पहाड में पर्यटन,धार्मिक पर्यटन, कृषि,बागवानी से जुडे विषयों पर लिखते रहता हूँ । यूट्यूब चैनल RURAL TALES और इस blog के माध्यम से गांवों की डाक्यूमेंट्री तैयार कर नए आयाम देने की कोशिश में जुटा हूँ ।

4 responses to “संजीवनी बूटी का गाँव जहाँ वर्जित है हनुमान जी की पूजा”

  1. Babita gusain says:

    बहुत सुंदर जानकारी दी है आपने, मन तो कर रहा है की हम भी यहां जाए। बहुत-बहुत धन्यवाद आपका ,इतनी अच्छी पोस्ट डालने के लिए।

  2. Ram shankar maurya says:

    Bahut hi achchi jankari apko dhanywad

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