03 December, 2022

ब्रह्मताल उत्तराखंड

brahamatal uttarakhand

देवभूमि में हिमालय की तलहटी में कई दैवीय ताल स्थित है। एक ऐसा ही देव शक्ति का ताल चमोली जिले के देवाल ब्लॉक में स्थित है। ये ट्रेक उत्तराखंड के सबसे बेहतरीन विंटर और रैनी सीजन ट्रैक में से एक है। समुद्रतल से 10 हजार फ़ीट पर स्थित ब्रह्मताल प्रकृति प्रेमियों के लिए स्वर्ग से कम नही है। विंटर ट्रैक के रूप में यह देश में तेजी से पॉपुलर होता जा रहा है।

यहाँ आने के लिए आप हल्द्वानी और ऋषिकेश दोनों मार्ग से आ सकते है। हल्द्वानी से बस द्वारा या टैक्सी से लोहाजंग तक आ सकते है। काठगोदाम रेलवे स्टेशन से आपको लोहाजंग तक सीधे बस या शेयर्ड टैक्सी नही मिल सकती इसलिए आप कई गरुड़, ग्वालदम और फिर देवाल तक आ सकते है। देवाल से लोहाजंग के लिए टैक्सी मिल जाती है। काठगोदाम से लोहाजंग करीब 224 किमी की दूरी पर बसा है। ऋषिकेश से आप रोडवेज की बस से थराली तक आ सकते है। थराली से देवाल तक आपको टैक्सी मिल जाएगी।

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लोहाजंग है ब्रह्मताल ट्रैक का बेस कैम्प

ब्रह्मताल ट्रैक का बेस पॉइंट लोहजंग है। जब आप लोहजंग से अपना सफर शुरू करेंगे तो आपको इस सफर में घने देवदार, बांज, बुराँश का जंगल मिलेगा जो करीब 6 किमी तक पड़ता है।

ब्रह्मताल एक उच्च हिमालय बुग्याल झील है। ट्रैक में आपको त्रिशूल, नंदा घुँघटी, नीलकंठ, कामेट, चौखम्भा और हाथी घोड़ा, केदारनाथ जैसे हिमालयन पीक दिखाई देती है। ब्रह्मताल जाने के इस समय दो प्रमुख मार्ग है। पहला मार्ग लोहाजंग से जो करीब 13 किमी की दूरी पर स्थित है। जबकि दूसरा मार्ग रतगांव से है जो 12 किमी की दूरी पर स्थित है। इस झील से 6 किमी पहले एक और झील है जिसे भेकल ताल कहते है। मान्यता है कि यहाँ पर भेकल नाग रहता है।

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सर्दियों और बसंत ब्रह्मताल के लिए बेस्ट टाइम

2 तालों के सफर में आप वर्ष भर किसी भी मौसम में आ सकते है लेकिन सर्दियों और बसंत के मौसम में यहाँ कुदरत अपने शबाब पर रहती है। ब्रह्मताल ट्रेक पर जाने के मार्ग में बुराँश पेड़ों की अलग अलग प्रजातियों है जो बसंत के समय लाल और सफेद फूलों से खिल जाती है। लोहाजंग से सुबह करीब 4 बजे मैं किशन सिंह दानू जी के साथ ब्रह्मताल के लिए निकले। बरसात के बाद सितंबर के समय जब लोहाजंग से निकले तो करीब 2 किमी तक चिड़ियों की सुरीली आवाज हमारे साथ दी। जैसे जैसे आगे बढ़ते गए बाँज, बुराँश, काफल की प्रजातियां हमारे स्वागत में खड़ी थी। रास्ते में मुन्दोली गाँव के लोगों की छानियां भी दिखाई दी। करीब 2 किमी का सफर तय करने के बाद घना जंगल शुरू हो गया। बीच बीच में छोटे छोटे जलस्रोत और पानी की धाराएं जंगल के शांत वातावरण को खत्म कर देते। करीब 5 किमी की हल्की की चढ़ाई के बाद हम धार पर पहुँचे। इस जगह पर एक छोटी झील है जिसे खोपतरिया कहा जाता है। यहाँ पर पान सिंह बिष्ट साल भर रहते। इस जगह पर आपको रुकने और खाने पीने की व्यवस्था मिल जाती है।

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ब्रह्मताल से पहले भेकलनाग ताक के दीदार

भेकलनाग की भी कहानी है। कहा जाता है कि इस ताल पर पहले भेकलनाग रहता था। एक बार रतगांव के एक बुजुर्ग से भेकलनाग के दर्शन किए लेकिन उस व्यक्ति का कोई पता नही चला। भेकलनाग से उस व्यक्ति को सोने और हीरे से सजा दिया और उससे कहा कि किसी को भी नही बताना। उस व्यक्ति की पत्नी ने जब कई बार इसका जिक्र किया तो उसने बता दिया।जैसे ही उस बुजुर्ग व्यक्ति ने राज खोला  उसकी मौत हो गई। मान्यता है गाँव में जो पानी की धारा है भेकलनाग ताल से आ रही है। भेकलनाग ताल बाँज, बुराँश, मोरू, खरसु और कई अन्य प्रजातियों के पेड़ों से घिरी एक फारेस्ट लेक है। ताल के एक किनारे पर भेकलनाग का मंदिर भी बना हुआ है और वही से ताल का पानी भी बाहर निकलता रहता है।

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जंगल खत्म होते ही शुरू होता है बुग्याल

इस ट्रैक में सबसे पहले जंगल का रास्ता खत्म होने के बाद तिलंदी बुगयाल पड़ता है जहाँ से त्रिशूल और नंदा घुँघटी की पहली झलक दिखाई देती है। आप जैसे जैसे आगे बढ़ेंगे बुग्यालों की रहस्यमयी दुनिया आपका इंतजार कर रही होगी। जिसमें खबेखाल, भरणपाटा उसके बाद ब्रह्मताल पड़ता है। ब्रह्मताल से आगे ढुंगा बुगयाल पड़ता है फिर दुडी पड़ता है। उसके बाद मर्तोली फिर तकीली कुड़ी और फिर लाटू लिंग पड़ता है। सर्दियों के समय झंडी टॉप और ब्रह्मताल टॉप से आपको हिमालय की अद्भुत रेंज यहाँ से दिखाई देगी।

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जब भगवान ब्रह्मा ने यहाँ पर की थी तपस्या

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ब्रह्मताल की अपनी पौराणिक मान्यता है। कहा जाता है कि भगवान ब्रह्मा जब हिमालय में भगवाल भोलेनाथ को खोजने  निकले तो उन्होंने इस स्थान पर तपस्या की और कुंड में स्थान भी किया। ताल के पास ही ब्रह्म भगवान का मंदिर भी बना हुआ है जो पत्थरों से निर्मित है। ब्रह्मताल एक बुग्याल झील है जिसमे आस पास के बुग्यालों का पानी आता रहता है। यह करीब 80 मीटर लंबी और 40 मीटर चौड़ी झील है। ब्रह्मताल से आगे भी कई बुग्याल है जहाँ बरसात के समय रंग बिरंगे फूल खिले रहते है।

Sandeep Gusain

नमस्ते साथियों।

मैं संदीप गुसाईं एक पत्रकार और content creator हूँ।
और पिछले 15 सालों से विभिन्न इलेक्ट्रानिक मीडिया चैनल से जुडे हूँ । पहाड से जुडी संवेदनशील खबरों लोकसंस्कृति, परम्पराएं, रीति रिवाज को बारीकी से कवर किया है। आपदा से जुडी खबरों के साथ ही पहाड में पर्यटन,धार्मिक पर्यटन, कृषि,बागवानी से जुडे विषयों पर लिखते रहता हूँ । यूट्यूब चैनल RURAL TALES और इस blog के माध्यम से गांवों की डाक्यूमेंट्री तैयार कर नए आयाम देने की कोशिश में जुटा हूँ ।

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